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Tuesday, June 9, 2020

ओसीडी, डिस्लेक्सिया को हराकर जीतने वाली 2 महिलाएं, एक हैं बिजनेसवुमन तो दूसरी बनी नेटवर्क द डॉट्स की सीईओ

जब घर में किसी बच्चे को गंभीर बीमारी का पता चलता है जैसे डिस्लेक्सिया या ऑटिज्म तो पैरेंट्स की फिक्र हर दम बनी रहती है।उनकी परेशानी उस वक्त औरबढ़ जाती है जब यही बच्चा सामाजिक रूप से अन्य बच्चों से कटने लगता है। ऐसे बच्चों के लिए दुनिया के साथ तालमेल बैठाना और कॅरिअर में सफलता पाना भी आसान नहीं होता। तमाम शारीरिक दिक्कतों के बाद भी विभिन्न रिसर्च यह साबित करते हैं किइन बच्चों में सुपर पॉवर होती है। इसी वजह से वे दुनिया को जीतने का दम रखते हैं।
हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की रिसर्च के अनुसार न्यूरोलॉजिक डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों में असाधारण शक्ति होती है। उनकी यही ताकत चीजों को याद रखने और मैथ्स जैसे विषय में कुशलता पाने के रूप में भी देखी जाती है। यहां हम बात कर रहे हैं ऐसी दो मेगा सक्सेसफुल वुमन की जो न्यूरोलाॅजिकल डिसऑर्डर से ग्रस्तहोने के बाद भी सफल हैं।

1. बैरोनिस मिशेल मोन : मैं वो हर काम कर सकती हूं जो मशीन करती है

बैरोनिस ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर (ओसीडी) से ग्रसित हैं। वे एक बिजनेसवुमन और तीन बच्चों की मां हैं। वे कहती हैं जब मैं 30 साल की थी, तब तक मुझे इस बीमारी के बारे में पता नहीं था।वे ईश्वर को धन्यवाद देती हैं कि इस बीमारी के बाद भी वे अपने बिजनेस में सफल रहीं। हालांकि कई बार उन्हें इस बात का अहसास होता है कि ओसीडी की वजह से वे मानसिक रूप से कई कामों में उलझती हैं।

कामयाबी उनके कदमों में है

बैरोनिस पूरे आत्मविश्वास के साथ यह कहती हैं कि मशीन जो काम कर सकती है, मैं वह हर काम करने में सक्षम हूं। वे मानती हैं कि उन्होंने तीन बच्चों की परवरिश करते हुए सही वक्त पर अपने बिजनेस को लेकर सही फैसला किया। आज कामयाबी उनके कदमों में हैं।

मेरी आदत में शुमार है

बैरोनिस के अनुसार चीजों को व्यवस्थित करके रखना चाहे ओसीडी का हिस्सा हो लेकिन अब ये मेरी आदत में शुमार हो गया है। मैं चाहे कितनी ही व्यस्त क्यों न हो जाऊं लेकिन जब तक पूरा घर व्यवस्थित नहीं हो जाता, मुझे नींद नहीं आती है।

जीना सीख लिया

वे स्वीकार करती हैं कि मुझमें इतनी ताकत है जैसे मैं कोई मशीन हूं। मैं किसी भी काम को एक मशीन की स्पीड से पूरा कर सकती हूं। उन्हें अभी भी वह समय याद है जब उनके बच्चे छोटे थे और कई बार चीजों को व्यवस्थित रखने की वजह से वे अपने बच्चों के साथ चाहकर भी समय नहीं बिता पाती थीं। लेकिन अब बैरोनिस ने अपनी बीमारी के साथ ही जीना सीख लिया है।

2. पिप जैमिसन : डिस्लेक्सिया को कहना चाहती हूं थैंक्स
40 साल की जैमिसन प्रोफेशनल नेटवर्क द डॉट्स की सीईओ हैं।वे सेंट्रल लंदन में अपने पति के साथ रहती हैं। जैमिसन कहती हैं कि अगर सेल्फ मेड मिलियोनेयर्स की बात की जाए तो इनमें से 40 प्रतिशत लोग डिस्लेक्सिया से ग्रसित हैं।

परफेक्ट हाेता है विजन
येल यूनिवर्सिटी में की गई स्टडी के अनुसार डिस्लेक्सिया से पीड़ित लोगों काविजन परफेक्ट होता है। वे इसी के सहारे दुनिया को अपने हिसाब से देखते हैं। उनके विचार और क्रिएटिविटी की सराहना हर जगह होती है।

मां ने दिया हमेशा साथ
जैमिसन यह मानती हैं कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। उन्हें इस बीमारी का महज 8 साल की उम्र में ही पता चल गया था। बचपन मेंजैमिसन के टीचर आए दिन उनकी मां से शिकायत करते रहते थे। उन्हें ये देखकर बहुत बुरा लगता था। लेकिन मां हमेशा जैमिसन का ही साथ देती थी।

चुनौती को स्वीकार किया

जैमिसन कोबचपन से ही ऐसेबच्चों की कहानी सुनने को मिली जो इस बीमारी से घिरे होने के बाद भी जीवन में सफल रहे। उन्हीं दिनों से जैमिसन नेजीवन में कुछ कर दिखाने की चुनौती स्वीकार की। आज उनकी कमाई 13 मिलियन डॉलर है।

बीमारी को ताकत मानती हैं

जैमिसन अपनी सबसे बड़ी योग्यता खुद के टैलेंट को पहचानना मानती हैं। वे अपनी बीमारीको कमी नहीं, बल्कि ताकत बनाकर इस्तेमाल करने का हुनर जानती हैं। इसी की बदौलत आज वे मनचाहे मुकाम पर हैं।



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2 women who beat OCD, dyslexia, with hard work and conquered the world


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